Wednesday, January 29, 2020

भगवद गीता १५. पुरुषोत्तम योग

भगवद गीता

१५. पुरुषोत्तम योग 

जीवात्मा प्रकृति में लीन हुए पंचेन्द्रियों और मन के जरिए दुनिया के अनुरक्षण केलिए आत्मा को संसार में आकर्षित करते हैं! जिस प्रकार पुष्प की खुशबु को हवा लेजाता है, वैसे ही जीवात्मा शरीर छोडते समय, पुण्य पापों को तथा इन्द्रिय गुणों को लेकर नया शरीर में प्रवेश करता है! इसप्रकार संसार के अनुरक्षण केलिए प्रकृति कर्मबंन्धनों के जरिए मनुष्य को पुनर्जन्म देकर धर्ती पर जीवन चक्र बनाया रखता है! जीवात्मा इन्द्रियों को लेकर विषयों को भोगता है! आत्मा को मूढ जन नहीं समझ सकते हैं! योगी जन ध्यान के मार्ग से आत्मा की अनुभूति करलेता है! ज्ञानी कर्मबंन्धनों को वैराग्य रूपी शस्त्र से काटकर परम पुरुष के शरण लेकर पुनर्जन्म से बचता है! 

सूर्य - चंन्द्र को तथा सारे दुनिया को प्रकाश देनेवाला तेज है ईश्वर! वह अपनी शक्ति के एक अंश से सारा दुनिया को धारण किया है! चन्द्र के किरणों में ईश्वर रस रूप में रहकर वनस्पतियों में औषध गुण पैदा करता है! प्राणियों में वैशानर ( पचन शक्ति के देव ) बनकर विविध आहार पचाता है, और उनके हृदय में रहकर ज्ञान, स्मरण, विस्मृति आदी करवाता है! दुनिया में पुरुष दो रूप में विराजमान हैं! एक क्षर रूप है और दूसरा है अक्षर! तृण से लेकर ब्रम्हा तक के विभूतियाँ क्षर है! परमात्मा जिसे कुडस्त कहा जाता है वह अक्षर से भी परे हैं! इसलिए उन्हे पुरुषोत्तम नाम से वेदों में पूजा प्रशंसा कीया है! जो मनुष्य वह परम पुरुष को जानता है, उन का जन्म सफल है और वह सर्व ज्ञानी है! 

अभिमान आदी मिध्या भ्रम को जो पार किया है, पुत्र दारादि में जिस को अति ममता नहीं है, जिसकी निष्ठा आत्मज्ञान में है, अविद्या से मुक्त है, जो वैरागी है, वह अनश्वर स्थान प्राप्त करने का अधिकारी है! पुरातन से या आदी में जिसे यज्ञ आदी कर्म उत्पन्न होकर सारी दुनिया में विसतृत हुआ, उस आदिपुरुष का शरण लेकर उनको समर्पण से स्मरण पूजन करके रहनेवाला परम धाम प्राप्त करता है! 

मोक्ष मार्ग में विजय होनेकेलिए देवासुर संबत के फरक समझना जरूरी है! योगी को दैविक संबत बढाना है और आसुर संबत से दूर रहना है! देवासुर विभाग अगला अध्याय में बताया है! हरि ओम।।

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