Friday, February 14, 2020

भगवद गीता १६. देवासुर संबद्विभाग योग

भगवद गीता

१६. देवासुर संबद्विभाग योग 

निर्भयता, चित्तशुध्दि, ज्ञानतृषणा, सदपात्रदान, योगानुष्ठान, स्वाध्याय, अहिंसा, सत्यवचन, अक्रोध, त्याग शील, ईर्षा का अभाव, विद्या, विषय विरक्ति, लोलता, लज्जा, अचपलता, प्रगल्भता, क्षमा, धैर्य, शौच, द्रोह चिन्ता का अभाव, सत्वगुण आदी दैविक या देव संबत से जन्म हुआ लोगों कि विशेषता है! असुर जन्मों को आत्म प्रशंसा, धन दौलत के अहंकार, मिध्याभिमान, क्रोध, कडुवचन, अविवेक आदी तामसिक गुण विशेष रूप से अति मात्रा में होता है! 

१६/१२ “ आशा पाशशतैर्बध्दाः काम, क्रोध, परायणाः 

ईहन्ते कामभोगार्थमन्ययेनार्थ संजयान “

आसुर जन्म के लोग विषय-सुख प्रथम समझकर अधर्म मार्ग से धन कमाकर काम मोह आदी के गुलाम बनकर दंभ मोह में आकर ईर्षा से अपने और अन्यों के अन्दर निवास करनेवाला परम पुरुष को पीडा पहुँचाता है! इन निर्दय और अथम मनुष्यों को आसुर योनी में गिरकर निरंन्तर जन्म लेना पडता है! 

१६/ २१ त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः

कामः क्रोधस्तथा लोभ तस्मादेत्रयं त्यजेत “ 

काम, क्रोध तथा लोभ आदी बुराइयाँ नरक के द्वार है! इसलिए इन्हें त्यागना होगा! जो ऐसा बुराई त्याग उनको मृत्युभय से मुक्त होकर परम पुरुष धाम को प्राप्त करसकती है! कर्म करने में भाव एवं श्रद्धा का बहूत महत्व है, आगे श्रध्दात्रयविभाग योग के बारे में जानेंगे! 

हरि ओम।।

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