Friday, January 10, 2020

भगवद गीता११. विश्वरूप दर्शन योग

भगवद गीता

११. विश्वरूप दर्शन योग गद्य


संपूर्ण रूप से पवित्रवान, अदम्य इच्छावान वह परम पुरुष के ऐश्वर्यमय रूप देखने की योग्य है! सर्व चराचरों को धारण किये वह परम विराट रूप या सर्वब्रम्ह मय अवस्था वह परम पुरुष के कृपा से अंन्तकरण रूप दिव्य चक्षु से देखने मिलता है और अनुभव किया जासकता है! सर्व संग त्याग किये पवित्र पुण्य पुरुष को हि ऐसा भाग्य मिलता है! 


अनेक मुख- नयनादि, अनेक भुजाऐं, अनेक पादपाणियाँ, सर्वत्र वदन  श्रवणादि एवं सूर्य जैसी तेज के साथ विराट रूप प्रकट हुआ! सृष्टि स्थिती संहार के अनंन्त समुद्र को देखकर वीर पार्थ भी चकित होजाता है! भयहीन साक्षातकार केलिए स्थिति नाथ श्रीहरि या महागुरु योगेश्वर कृष्ण, दुनिया के पापों को अपनेपर लेकर आश्रितों को रक्षा करनेवाला येशुदेव, शाँन्ति और अहिंसा मंत्र के वक्ता भगवान बुद्ध, प्रणव स्वरूप ऊँकारनाथ, कृयायोग के वक्ता परमहंस योगानंन्द जैसे अनेक महान देव- गुरु स्वरुपों को भक्ति भाव से उपासना से साक्षात्कार मिलजाता है! इसकेलिए भक्ति बडाना चाहिए, वह मार्ग भक्ति योग में बताया गया है! हरि ओम।।

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