Thursday, January 9, 2020

भगवद गीता १०. विभूतिविस्तर योग

भगवद गीता १०. विभूतिविस्तर योग 

इस ब्रम्हाण्ड में हर चीज का कारणभूत परमात्मा परमपुरुष है, जो स्रृष्टियाँ को विभूतियाँ माना जाता है! उनसे स्वतंत्र या अलग होकर कुछ भी नहीं रहसकता! जो मनुष्य ईश्वर का आश्रय लेता है उनको बुध्दियोग देता है, जिस के उपरान्त वह भक्त परम पुरुष को प्राप्त करसकता है! ईश्वर भक्त के ऊपर करुणा, अनुकंपा से उनके बुद्धि में से अज्ञान - अहंकार को मिटाने केलिए ज्ञान की ज्योति जलाकर संसार से निवृत्ति करवाता है! 

सूर्य, चंन्द्र, अग्नि, वायु आदी पाँच भूतें, सप्त समुद्र, हिमवान, मेरु आदी द्रृश्य-अद्रृश्य सब कुछ उनका अंमश है! संक्षिप्त में हम सब उस विराट पुरुष के आत्मा के अंश है! ईश्वर अपने शक्ती के एक अंश से इन विभूतियों को धारण करता है, चलाता है, एवं इस विश्व का पालन करता है! 

ईश्वर के ये विभूतियाँ परम पुरुष का क्लिष्ट रूप है! उनका उत्तम श्रेष्ठ रूप या परमात्म रूप विराट विश्वरूप है! सारे विभूतियों को धारण किये हुआ विश्वेश्वर विश्वरूप को आगे अध्याय में बताया है! हरि ओम।।

No comments:

Post a Comment