Wednesday, February 19, 2020

भगवद गीता १८. मोक्ष संन्यास योग

भगवद गीता

१८. मोक्ष संन्यास योग 


यज्ञ दान तपः  कर्म न त्याज्यं कार्य मेवतत् 

यज्ञो दानं तप छैव पावनानि मनीषिणाँ “

यज्ञ, दान, तप आदी कर्म पुरुषों को पवित्र करदेता है! इसलिए सन्ध्या वन्दन आदी दैनिक अनुष्टान नियमित करना चाहिए! शरीर क्लेश के डर से कोई कर्म त्यागता है तो वह त्याग तामसिक त्याग है! स्वधर्म का अनुष्टान से हि पुरुषार्ध प्राप्त कर सकता है! कोई भी प्राणी को कर्म पूर्ण त्याग नहीं कर सकता है! जो कर्म को त्यागता है वही सच्चा त्याग है! मनुष्य जोभी कर्म करता है उसका फल का भोक्ता स्वयं ही है! पाप कर्म का फल इस जन्म नहीं तो जन्म जन्मान्तर तो भी भोगना ही होगा! मगर निष्काम कर्म करनेवाला सन्यासी को कर्म फल का बन्धन नहीं होता है! इस लिए आप भी निष्काम कर्म करो, कर्म मुक्ति प्राप्त करो। हरी ओम।।।


सभी कर्म का आधार होता है-- शरीर, अहंकार, कर्ता, इन्द्रियों और ईश्वर! ज्ञान, ज्ञेय, तथा विज्ञाता - तीनों कर्म का कारण होता है! कर्म के आश्रय होता है - इन्द्रिय, लक्ष्य, कर्ता, तीनों! कर्तृत्व में अभिमान कर्ता को कर्म बन्धन बनाता है! सारे जीव-भूतों में आत्मा एक समान रहता है; ऐसा समझनेवाला बुद्धि है सात्विक! प्रत्येक प्राणी में आत्मा अलग- अलग समझनेवाला ज्ञान, राजसिक है! केवल स्वयं की शरीर में आत्मा है, और अन्यों के अन्दर आत्मा नहीं है ऐसा समझनेवाला ज्ञान को तामसिक ज्ञान  कहलाता है!सात्विक बुद्धि जो है, धर्म, अधर्म ; कार्य, अकार्य; भय, अभय तथा मोक्ष के कारण को खोजते हैं! जिस में यह नहीं है वह राजसिक है! अज्ञान के अधिकता से अधर्म को धर्म जैसे समझनेवाला तामसिक बुद्धि है! दुनिया इसप्रकार तीन ( सात्विक, राजसिक, तामसिक ) गुणों से बना हुआ है! हरि ओम।।


आरंभ में विष समान तथा परिणाम में अमृत समान होनेवाला सुख- जिसे मन प्रसन्न होती है, उसे सात्विक सुख कहते हैं! विषयों के संबन्ध से जो सुख आरंभ में मधु समान लगता और परिणाम में जहर जैसे बनजाता वह सुख - राजसिक सुख है! आदी से अंन्त तक बुद्धि को सम्मोह में डालकर विवेक को नष्ट करनेवाला सुख होता है- तामसिक ! परम पुरुष को, योग में रहकर गुणातीत रहकर अपना- अपना कर्म से आराधना करता है तो, सिद्धि तथा ब्रम्ह प्राप्ती मिलजाती है!  जो सन्यासी सात्विक बुद्धी और कर्म से परम पुरुष को पूजते हैं, विषय विचार और राग- द्वेष को वैराग से त्यागते हैं, आहार व्यवहार सीमित रखते हैं, वे सदा ब्रम्ह में स्थित रहते हैं! हिंसा और असहिष्णुता को बढावा देनेवाला पाप योनी में आसुर पाप जन्म लेकर घोर नरक प्राप्त करते हैं! 

योगी परमेश्वर के शरण में जाकर पापों से मुक्त होकर, मृत्यु भय से मुक्त होकर, मोक्ष एवं परम धाम प्राप्त करता है, यह सत्य है! 

१८/६६ “ सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहंत्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुच: “ 

हरि ओम।।

ऊँ तत् सत् 

Monday, February 17, 2020

भगवद गीता. १७. श्रद्धात्रयविभाग योग

भगवद गीता

१७. श्रद्धात्रयविभाग योग 


१७/२ “ त्रिविधा भवतिश्रद्धा देहिनाँ सा स्वभावजा

सात्विकी राजसीचैव तामसी चेतितां श्रृणु “ 

मनुष्य में सात्विक, राजसिक एवं तामसिक, इस तीन प्रकार के श्रध्दा होती है! सात्विक लोग परमपुरुष इन्द्रादी देवों को पूजता है! राजसिक लोग यक्ष, राक्षसों को पूजता है! तामसिक लोग, भूत-प्रेतों की उपासना करता है! इन लोगों के श्रद्धा, यज्ञ, तप तथा आहार भी भिन्न होते हैं! सात्विक लोग- स्निग्द, हृद्य, पौष्टिक, स्वादिष्ट आहार पसंन्द करते हैं! रजोगुण के लोग- गरम, तीखा, खट्टा, निमकीन आदी तीक्षण आहार पसंन्द करते हैं! तामसी लोग- निस्वादी, ज्यादा पकाहुआ, वासी अन्न पसंन्द करते हैं! 

शास्र के अनुसार, अपने कर्तव्य समझकर, फल अपेक्षा त्याग कर यज्ञ करनेवाला - सात्विक होता है! फल की आशा में अहंपूर्ती केलिए मान, सम्मान पाने हेतु यज्ञ करनेवाला रजोगुण के हैं! विधिविहीन, मंन्त्र विहीन और दक्षिण दान विहीन करता यज्ञ तामसिक हैं! हरी ओम।।


देव, ब्राम्हण, गुरु, ज्ञानी आदी पवित्र जनों की सेवा, पूजा, शैच, निषकपडता, ब्रम्हचर्य, अहिंसा आदी शारीरिक तप है! मृदु भाषण, वेद शास्त्रों का अध्यायन, सत्यवचन आदी वाणी के तप है! मन की निर्मलता, अध्यात्म चिन्तन, संयम, निष्कलंकता आदी मन की तप है! पुण्य स्थल में फल के इच्छा न रखते हुए, शुभ समय पर, योग्य पुरुष को दिया गया दान सात्विक है! प्रतिफल के इच्छा या सुख आदी के मोह में करनेवाला दान राजसिक है! अनुचित स्थान में अयोग्य व्यक्ति को निन्दा के साथ देनेवाला दान होता है तामसिक! 

गीता में श्रद्धा के बारे विशेष प्रकाश डाला है--

१७/३ “ सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत

श्रद्धामयो/यं पुरुषो यो यच्छ्रद्धाः स एव सः “

और वेद में भी कहा है --

श्रद्धा धर्म परः सूक्षमः श्रद्धा यज्ञ हुतं तपः 

श्रध्दा मोक्षंच स्वर्गं च श्रद्धा सर्व मिदं जगत् “ 

जिसकी श्रद्ध जैसा वैसा उन की कर्म गुण भी! श्रद्धा-- धर्म है, ईश्वर है, यज्ञ है, आहूति भी है! श्रद्धा यह जगत केलिए सबकुछ है! अश्रद्धा से करनेवाला कर्म असत है, उस का फल इस लोकजीवन में या परलोक काल में नहीं आयेगा! 

परमात्मा के सक्षात्कार केलिए सात्विक श्रद्धा बढाकर, परम उत्तम मोक्ष मार्ग संन्यास योग का आचरण करना पडेगा  जो अगले अध्याय में कहागया है! 

Friday, February 14, 2020

भगवद गीता १६. देवासुर संबद्विभाग योग

भगवद गीता

१६. देवासुर संबद्विभाग योग 

निर्भयता, चित्तशुध्दि, ज्ञानतृषणा, सदपात्रदान, योगानुष्ठान, स्वाध्याय, अहिंसा, सत्यवचन, अक्रोध, त्याग शील, ईर्षा का अभाव, विद्या, विषय विरक्ति, लोलता, लज्जा, अचपलता, प्रगल्भता, क्षमा, धैर्य, शौच, द्रोह चिन्ता का अभाव, सत्वगुण आदी दैविक या देव संबत से जन्म हुआ लोगों कि विशेषता है! असुर जन्मों को आत्म प्रशंसा, धन दौलत के अहंकार, मिध्याभिमान, क्रोध, कडुवचन, अविवेक आदी तामसिक गुण विशेष रूप से अति मात्रा में होता है! 

१६/१२ “ आशा पाशशतैर्बध्दाः काम, क्रोध, परायणाः 

ईहन्ते कामभोगार्थमन्ययेनार्थ संजयान “

आसुर जन्म के लोग विषय-सुख प्रथम समझकर अधर्म मार्ग से धन कमाकर काम मोह आदी के गुलाम बनकर दंभ मोह में आकर ईर्षा से अपने और अन्यों के अन्दर निवास करनेवाला परम पुरुष को पीडा पहुँचाता है! इन निर्दय और अथम मनुष्यों को आसुर योनी में गिरकर निरंन्तर जन्म लेना पडता है! 

१६/ २१ त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः

कामः क्रोधस्तथा लोभ तस्मादेत्रयं त्यजेत “ 

काम, क्रोध तथा लोभ आदी बुराइयाँ नरक के द्वार है! इसलिए इन्हें त्यागना होगा! जो ऐसा बुराई त्याग उनको मृत्युभय से मुक्त होकर परम पुरुष धाम को प्राप्त करसकती है! कर्म करने में भाव एवं श्रद्धा का बहूत महत्व है, आगे श्रध्दात्रयविभाग योग के बारे में जानेंगे! 

हरि ओम।।