Wednesday, January 1, 2020

भगवद गीता ६. ध्यान योग

भगवद गीता ६. ध्यान योग 


कर्म फल की अपेक्षा न रखतेहुए जो नियत काम करता है - वह है संन्यासी एवं योगी! केवल अग्नि को त्यागने से संन्यासी नहीं बनता और कर्म को त्यागने से त्यागी नहीं बनता! योग प्राप्त करने केलिए निष्काम कर्म है साधन! योग में सिद्धि प्राप्त होने के बाद योग में रहने का साधन है शम; शम का मतलब है - ध्यान, धारणा, समाथी तीनों का समन्वय! इन्द्रिय विषयों में जब इच्छा नष्ट होजाता है, या सर्व संकल्प परित्यागी बनगया योगी को योगारुठ कहलाता है! मन का नियंत्रण योगी के वश में रहना चाहिए! हरि ॐ


४/३५ “ असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्-

अभ्यासेनतु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते “

चिन्ताऐं मन को भ्रमण करते रहता है, फिर भी ऐसा मनको वैराग्य तथा अभ्यास से शांन्त कर सकता है! 

  योग के बारे में अन्य ग्रन्धों में कहा है- 

“ योग हीनं कथं ज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवं

योगोपि ज्ञान हीनस्तु न क्षमो मोक्षकर्मणि “ 

“ अहिंसा नियमेष्वेका मुख्यावैचतुरानना

सिद्धं पद्मं तथासिंहं भद्रंचेरिति चतुष्टयं “

योग बिना ज्ञान और ज्ञान बिना योग दोनों फलदायक नहीं है! यम, नियम, आसन, ध्यान आदी योग का अंग है! यम में मुख्य है नियंत्रित, मित आहार!  अहिंसा नियमों में प्रथम प्रथान है, आसनों में सिद्ध, पद्म, सिंह एवं भद्रं को अभ्यस करना है!  

हे प्रभु, हमें योग में अटल रखना, हरि ओम।।


पतंजली योग सूत्र में कहा है- एक ही चीज को लगातार बारह ( १२ ) सेकन्ड तक सोचना या याद करना एक ध्यान होता है! एक ध्यान का १२ गुना ( २मि १४ से ) एक धारणा होता है! बारह धारणा ( २८मि ४८से ) को एक समाधी कहलाता है! ध्यान का मतलब है मन के चेष्टाओं से सजक होकर, मन को ईश्वर चिन्तन में बार बार लाकर ईश्वर कृपा भक्ती प्रेम का अनुभव करना है; जिस से चिन्ताओं या मन चेष्टाऐं हट कर मन प्रशाँन्त एवं एकाग्र होजाता है! आत्म शुद्धी से मन को ईश्वर में लगाकर साक्षिभाव में रहनेवाला है योगी, आत्मा को पहचानने का मार्ग है ध्यान, ध्यान से आत्मज्ञान उगता है! 


“ समाघि समतावस्था 

जीवात्मा परमात्मनो “

जीवात्मा और परमात्मा का मिलन एवं ऐक्य होता है समाधि! ध्यान से समाधि तथा सिध्दि प्राप्त होता है, ज्ञान मिलता है, शरीर के दस तरह के वायु एकत्र होजाने से योगी निरामय/ निरोगी बनता है! 

हरि ओम।।


ध्यान अभ्यास करनेकेलिए स्वछ और निर्मल जगह में कुश, चर्म और उसके ऊपर रूई कपडा बिछाकर आसनग्रस्त होकर, इन्द्रिय, मन को संयम करके मन परमपुरुष पर एकाग्र करके आत्म शुध्दि केलिए ध्यान करना है! ध्यान करने केलिए परम पुरुष के अनेक विभूतियों को विस्तार रूप में बताया गया है! परमपुरुष के उत्तम उत्कृष्ट अव्यय रूप को मनन करना अच्छा होगा जो है-- 

८/९ “ कविं पुराणामनुशासितार-

मणोरणीयाँसमनुस्मरेध्य 

सर्वस्यधातारमचिन्त्यरूपं-

आदित्यवर्णम तमसः परस्तात “

  अणु से भी सूक्षम, सबको रक्षा करनेवाला, सब का आधार, सूर्य से भी प्रकाशवान, अज्ञान के परे, ऐश्वर्यमय, करुणारूपी, प्रेम स्वरूपी, अचिन्त्य रूप परमात्मा को ध्यान करो! शरीर को सीधा रखकर रीड को सरल रख कर शांन्त चित्त से ब्रम्हचर्य पालन करके, नासिका के अग्र में द्रृष्टि ठहराकर जो योग अभ्यास करता है वह शीघृ शांन्ति प्राप्त करता है, उनका ज्ञान प्रतिष्टित होजाता है,वह परमात्मा में जुडजाता है! उन के कुण्डलिनि जाग्रत होजाता है, सिध्दियाँ प्राप्त होता है, वह अज्ञान के परे होकर जीवनमुक्त होजाता है ज्ञान प्राप्त होता है! ऐसा ज्ञान का विशेषता, उपयोग आदी ज्ञान-विज्ञान योग में बताया है!

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