भगवद गीता
३ कर्मयोग गद्य
ज्ञान तथा कर्म दोनों एक ही लक्ष्य में पहूँचाता है, पर कर्म योग ही उत्तम है! कोई भी प्राणी कर्म किये बिना रह नहीं सकता तथा कोई लक्ष्य प्राप्त करने का साधन है कर्म तथा ज्ञान! योग का मतलब है आत्म बुद्धि में स्थिर-स्थित रहना और ज्ञान होता है परमात्मा या ईश्वर को जानना!
“ समाथि समतावस्था जीवात्म परमात्मनो “ जीवात्मा और परमात्मा का समन्वय है समाथि!
सृष्टि चक्र में, कर्म को महत्वपूर्ण स्थान है! ब्रम्हा- वेद- कर्म- यज्ञ- वर्षा- अन्न- प्राण; सब सृष्टि चक्र का अंग है! एक दूसरे को उतपत्ती केलिए आपस में अवलंब करता है और कर्म जन्य यज्ञ में परमात्मा या ब्रम्हा सदा रहता है! कोई भी लक्ष्य पाने केलिए कर्म ही एक मात्र साधन है! विश्व के पालक, श्रीहरि महत्वपूर्ण कर्म करने अनेक जन्म लेते रहते हैं! उस महापुरुष के मार्ग पर हम सब कर्म निष्ट बनकर धर्म स्थापनना में सहभागी बनना चाहिए !
कोई भी कर्म हो उस केलिए आरंभ महत्व पूर्ण है! वचन है- शूभस्य शीघ्रम! शुभ कर्म केलिए विलंब मत करो! अज्ञानि आशा से या संग से मुझे यह चाहिए, वह चाहिए ऐसा मोह में आकर कर्म करता है! ज्ञानी स्वयं कर्म करते हुए अन्यों को भी कर्म में सहभाग करवाना चाहिए! ज्ञानी हो या योगी- सब अपना संस्कार के अनुसार कर्म करते हैं! इसलिए कर्म योग या कर्म मार्ग में इन्द्रिय नियंत्रण को बडा महत्व है! क्यों कि - राग-द्वेष आदी विकार इन्द्रियों में रहता है! हित कार्य में खुशी तथा अहित कार्य में होता है द्वेष या क्रोध! इसलिए राग-द्वेष का कारण बननेवाले विषयों को योगी जन त्यागना चाहिए! परंन्तु जो पुरुष इन्द्रियों को निग्रह करके भी विषयों का कामना या आशा रखता है, वह मूढ तथा पापी है; उन्हे पाप से बचने, अपना आचार- विचार एवं काम-क्रोध आदी रजोगुण त्यागना चाहिए ! इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि को आसन बनाकर काम क्रोध विराज होता है! आत्मज्ञान को नष्ट करनेवाला - पाप स्वरूपी काम को जीतने केलिए हमेशा याद रखो-- ३/४२ “. इन्द्रियाणि परण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ! मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ! “ शरीर से श्रेष्ट है इन्द्रिय, इन्द्रिय से महान होता है मन, मन से उत्कृष्ट है बुद्धि, और बुद्धि से भी महान है आत्मा! इस ज्ञान के द्वारा -- बुद्धि से मन नियंत्रण करते हुए, आत्मा को सदा मनन करते हुए, मन को टुकरानेवाला काम-अज्ञान रूपि शत्रु को जीत कर धर्मानुसार कर्म स्वरूप यज्ञ करके श्रेय पाओ! वह मोक्ष एवं ऐशर्य दायक है!
आज करने का काम को कल केलिए न रखते हुए आज ही समाप्त करे (दीर्खसूत्री न बनें) , शूरवान, कृतज्ञ तथा दृढ सौहृद रखनेवाला पुरुष को लक्ष्मि देवि स्वयं अनुग्रह करती है, एवं सारे ऐश्वर्य लाभ देती है!
स्वधर्म श्रेष्टता एवं अमरता का मार्ग है! परधर्म पालन पाप और नरक दाई है! अलसी और मूढ लोगों को कर्म में कर्तृत्व मिलता है! अहंकार या दंभ के कारण स्वयं सबकुछ किया इस प्रकार सेचकर मूर्ख कर्तृत्व अपने ऊपर लाता है! मगर सच्च यह है कि प्रकृति के वश में मनुष्य माया मोहित कर्म कर्म करते हैं! परन्तु ज्ञानी जन कर्मों को अलिप्य अधवा मोक्षलायक बनाते हैं, उस का मार्ग अगले अध्याय ज्ञान कर्म संन्यास योग में सीखेंगे!
हे भगवान, हमें अपने दास मानकर सेवा करने दीजिए, हरि ओम।।
No comments:
Post a Comment