Sunday, December 22, 2019

भगवद गीता ज्ञान कर्म सन्यास योग ४

भगवद गीता

४. ज्ञान कर्म संन्यास योग 


४/७ “ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम !!” 

जब जब धर्म का नाश होकर अधर्म का राज होने लगता है; तब तब साधु जनों को संभालने और दुर्जनों को नाश करने परंपुरुष युग युग में अवतार लेते हैं ! जो कर्म सही से नहीं करता है उन्हे शाँन्ति नहीं मिलेगी एवं कर्म के बन्धनों में वह फसते जाते हैं! कर्म गुण के अनुसार प्रकृती में चार वर्ण बना हुआ है! धर्ती में जन्म हुआ तो उन्हे अपने आत्मा का सदगती केलिए अच्छा धर्म कर्म करना है!  

हे भगवान, हमें प्रशिक्षण करने, हमारे मन में हमेशा रहने केलिए प्रार्थना, हरि ओम ॐ।।


कर्म की गति अति सूक्ष्म है! इसलिए कर्म, अकर्म, विकर्म को जानना चाहिए! कर्म अर्थात जो करने योग्य कर्म! विकर्म -- जो नहीं करना चाहिए या निषिध कर्म! धर्म यज्ञरूप का कर्म -- सार्वजनिक कल्याण हेतु कर्म जिस में कोई लोभ मोह नहीं है वह अकर्म है! कर्म देहधारी संबन्धि है, आत्मा को कर्म नहीं है! फल की आशा, संग, मोह, अहं आदी से कर्म लिप्त होता जाता है! परंन्तु जो इन्द्रियों को जीतकर आत्मज्ञान एवं धर्म अनुसार कर्म करता है, वह कर्म से लिप्त नहीं होता है! या परमात्मा के स्मरण में किये कर्म यज्ञ बनजाता है! 

हे भगवान, हमें आत्मज्ञान दे, धर्म कर्म में स्तिर रखे। हरि ओम।।


  गीता में अनेक प्रकार के यज्ञों को बताया गया है! कोई श्रोत-श्रवण इन्द्रिय गुणों को हविस बनाकर संयम के अग्नी में यज्ञ करते हैं, कोई विषय संवेदों को शरीर रूप होम कुण्ड में हवन करके यज्ञ का अनुष्टान करते हैं, और कोई आत्मसंयम स्वरूप अग्नि में राग-क्रोध-मोह आदी को आहूती देकर यज्ञ करते हैं! कोई मित आहार निष्टा से शरीर के पचन स्वरूप अग्नि में यज्ञ करते हैं, या कोई योगी प्राण - अपान स्वास की शक्ती से प्राणायाम के रूप की यज्ञ करते हैं! द्रव्यदान, तप, स्वाध्याय द्वारा भी कठिन व्रतवाले यज्ञ करते हैं! इसप्रकार देखे तो हम सब यज्ञ करते ही रहते हैं! परमात्मा के स्मरण के साथ स्वास - उच्वास करता तो वह भी यज्ञ है! हर एक स्वास आप को परमात्म स्मरण में परमानंन्द में पहूँचाऐंगे! यज्ञ सब पापों को मिटाता है!

हे भगवान, हमें भी योगी और यज्ञ भाग बना दे। हरि ॐ।।


 यज्ञ अवशिष्ट या यज्ञ फल अमृत समान है! उसका भोक्ता अमर होजाता है एवं मोक्ष प्राप्त करलेता है! जो यज्ञ नहीं करता उनको इस लोक में सुख या परलोक में शाँन्ति नहीं मिलेगी! ईश्वर को अर्पण किये सभीकर्म को ब्रम्ह यज्ञ कहलाता है! यज्ञ देता है आत्मज्ञान! जैसे अग्नि चिता को भस्म करता है, वैसे यज्ञ मनुष्य की पापों को भस्म करता है! कितना बडा पापी हो तो भी ज्ञान के यान से पाप के बडा दरिया भी पार किया जा सकता है! वह ज्ञान एक निपुण गुरु से - चरण सेवा, संशय निवारण, उपदेशलाभ आदी मार्ग से प्राप्त करना चाहिए !  शिष्य को योग्य गुरु के चयन की सक्षमता अवश्य होना चाहिए! 

हे प्रभु, आप हमारे सदगुरु हो, हमें सही रास्ता में चलाएं। हरि ॐ।।

   आत्मज्ञान लाभ किये गुरु दुर्लभ है, अज्ञानी सिद्ध बहूत है! गुरुगीता आदी ग्रन्थों में अनेक प्रकार के गुरु का वर्णन है! पहला है सूचक गुरु- वह लौकिक जीवन में सम्मान लाने योग्य है! दूसरा है- वाचक गुरु, वह संन्यास आदी आश्रम व्यवस्था के बारे में सिखाता है! तीसरा है- बोधक गुरु- “ पंचाक्षर “ आदी मंत्र शिष्य को उपदेश देनेवाला! चौथा है - विहित गुरु - संसार जो दुःख का कारण है, उसे मुक्ती केलिए मोक्ष गती या मार्ग (वैराग ) बतानेवाला! पाँचवां है - कारणाख्य गुरु - जो “ तत्वमसि “ आदी महत वचनों के उपदेश करके संसारिक दुःखों से पीडित मनुष्य को वैराग्य एवं मोक्ष का मार्ग दिखानेवाला! छट्टवां है - परम गुरु - शिष्य के सारे संशयों को दूर करके उन को जन्म - मरण चक्रों से बचानेवाला! सातवां है - महागुरु- ब्रम्ह पद में पहूँचा ऐसे महात्मा अतिदुर्लभ है, वह शिष्य का सारे संसार बंन्धनों को निर्मूल मिटाकर शिष्य को भी महात्मा बनाता है! 

हे प्रभु, अाप हमारे सदगुरु एवम् संरक्षक भगवान् हो। हरी ॐ।।


 आठवां है - आत्म गुरु - जिस में ज्ञान तृष्ण, भक्ती एवं वैराग उगजाता है, उन के अंतर परमात्मा ज्ञान के बीज डालकर आत्मज्ञान के ज्योती जलाते हैं! भक्तप्रहलाद, कच, सुनीतितनय दृव, गौतमबुद्ध जैसे महद् व्यक्तियाँ आत्मगुरु से साक्षात्कार किये हैं!नौवां है - तामसी/निषिध गुरु - जादु-टोणा ताँत्रिक, हिंसा, हत्या, स्पर्था, आतंक आदी हीन, क्रूर एवं नीच मार्ग का उपदेश देकर शिष्य और परिवार को नरक में डालता है! आत्मज्ञान चाहनेवाला उनका आश्रय कभी नहीं लेना चाहिए! 

 कहा है “ मधुलुब्धो यथा भ्रृंग, 

पुष्पाल पुष्पांन्तरं व्रजेल

ज्ञान लुब्धोस्तथा शिष्यो

गुरूरगुर्वान्तरं व्रजेल! “

जैसे जिस फूल में मधु खतम हुआ  तो मधुमखी दूसरा फूल डूँडता है वैसे परम ज्ञान प्राप्त होनेतक महान से महान गुरु के पास जाना पडेगा! ईश्वर से बडा है गुरु ऐसे दावादेनेवाला गुरु ईश्वर निन्दा करता है, विशवास योग्य नहीं है! 

जिसको संशय बुद्धी है उनको आत्मज्ञान नहीं मिलेगा! इसलिए सद गुरु को प्राप्त कर, अज्ञान से बना संशय को ज्ञान रूपी शस्त्र से काटकर कर्म योग द्वारा अपने लक्ष्य को पाओ, यश प्राप्त करो! 


कर्म योग के अनुष्ठान में निष्टा और संन्यास को महत्व पूर्ण स्थान है, जो कर्मसंन्यास योग में सीखोंगे! 


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