भगवदगीता
२. साँख्य योग गद्य
१/३५“ एतान नः हन्तुमिच्छामि ध्नतो$पि मधुसूदन !
अपि तैलोक्यराजस्य हेतोः किं नु महीपते !!”
हे मधुसूदन वे मुझे मारता तोभी में उन्हे नहीं मारूँगा! तीनों लोक मिला तोभी नहीं, फिर एक टुकडा जमीन केलिए क्यों ? राज्य सुख के मोह में स्वजनों की हत्या करूँगा तो महापाप लगेगा! ऐसा कहकर पार्थ आँसु बहाते हुए चुप बैठ जाते है! औऱ कहता है --
“करपन्नय्या दोषो अपहृत स्वभाव:
पृच्छा मि तवं धर्म सम्मुड़ चेत:
य: श्रेय: निस्चित ब्रुउही तनमे
शिष्य सतो हम शधिमाम् प्रपन्नम।
मैं आप के शरण में आया हुँ ! मुझे मार्ग दर्शन कीजिए, अपना शिष्य बनाईए ! (ऐसे हमें भी भगवान के शिष्य बनना है।) ऐसे कहकर पार्थ चुप बैठ गये और उन की आँखोंसे आँसु बहने लगी !
विषादग्रस्त सखा को देखकर कृष्ण भी करुणा से भर गये !
भगवान सहानुभूति देनेवाली मधुर मन्दहास के साथ दुःख मिटाने का उपाय अथवा योग- मोक्ष संन्यास योग तक सारे योग रहस्य जो अध्यात्मज्ञान से संपूर्ण है उसे बताने लगे! पर पहले अर्जुन को दाठते है प्यार से--
२/२-३.
“ कुतस्त्वा कशमलमिदं विषमे समुपस्थितम्
अनार्यजुष्ट मस्वर्ग्य मकीर्तिकरमर्जुन !
क्लैब्यं मा स्म गम पार्थ नैत्त्व्युपपद्यते
क्षुद्रं हृदयदौरबल्यं त्यक्तोत्तिष्ठ परंतप !! “
ऐसे कठिनाई के समय पर तुम्हे मूढता क्यों सूझी ? यह तुम्हारेलिए उपयुक्त नहीं है! कायरता छोडकर उठो, हृदय दुरबल मत करो, तुम युद्ध करो ! इतना सब भगवान के कहनेपर भी पार्थ नहीं माना और पार्थ भगवान से तर्क वितर्क करने लगा!
२/५ “ गूरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो
भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके !
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुज्जीय भोगान रुधिरप्रदिग्धान् !!”
पूजनीय गुरु पिता को मारकर मिली सुख संपत्ती स्वीकारने लायक नहीं है! वह रक्त रंजित होगा! इस से अच्छा तो भिक्षा माँगकर जीना है! मुझे क्या करना है समझ नहीं आरहा है! मैं विवेक खो बैठा हुँ!
मैं आप के शरण में आया हुँ ! मुझे मार्ग दर्शन कीजिए, अपना शिष्य बनाईए ! ( एसे हमें भी भगवान के शिष्य बनना चाहिए) ऐसे कहकर पार्थ चुप बैठ गये और उन की आँखोंसे आँसु बहने लगी ! विषादग्रस्त सखा को देखकर कृष्ण भी करुणा से भर गये ! भगवान सहानुभूति देनेवाली मधुर मन्दहास के साथ दुःख मिटाने का उपाय अथवा योग- मोक्ष संन्यास योग तक सारे योग रहस्य जो अध्यात्मज्ञान से संपूर्ण है उसे बताने लगे!
“ तुम अनर्ह केलिएल दुःखी होरहा है! परंन्तु ज्ञान की बातें करते हो! लेकिन सच्चा ज्ञान है कि- जो है उसका नाश नहीं और जो नहीं है उसका आस्तित्व नहीं है! मैं, तुम, यह सब राजाऐं सब यहीं थे, यहीं रहेंगे, क्यों कि सारा जगत ईश्वर की शक्ती से भरा है,
आत्मा को मृत्यु या जन्म नहीं है! वह पुरातन तथा अव्यय है!
जीवात्मा जो है वह परमात्मा का अंश है जो शरीर प्राप्त करके --२/२२ “ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृहणाति नरो $परणि!
तथा शरीराणि विहाय जीर्ण - न्यन्यानि संयाति नवानि देही !! “
मनुष्य जैसे पुराना वस्त्र बदलकर नया पहनते हैं वैसा आत्मा भी जीर्ण शरीर छोडकर नया शरीर स्वीकार लेता है! फिर वह शरीर में रहकर बाल्य- यौवन- बुठापा आदी सुख- दुःख विधिपूर्व अनुभव करता है!
शीत- उष्ण आदी नैमिषिक व्यथा सब को अनुभव एवं सहन करना ही है! वह प्रकृती की नियम या व्यवस्था है! उसे कोन बदल सकता है ? इसलिए कहा है-- २/१५ “ सम दुःख सुखं धीरं
सोमृत्वाय कलपते “
दुःख जिसे बदलता नहीं या जो इन व्यथाओं से विचलित नहीं होता उन्हे दुनिया अमर मानती है!
आत्मा को जानने का मार्ग है योग! आत्मा - अव्यक्त, अचिन्त्य, विकार रहित तथा इन्द्रियों के परे है! इस प्रकार आत्मा का तत्व जानकर तुम अपने कर्म करो! साँख्य योग के अंतरगत आत्म संबधित ज्ञान को यहाँ स्पष्ट किया है!
आगे भगवान साँख्य योग के अंतरगत कर्म संबन्धित योग ज्ञान - बुद्धि उपदेश कर रहा है ! इस धर्म-कर्म योग का थोडा भी ज्ञान हम्हे जनम - मरण जैसे महाभयों से मुक्त कर देता है! स्व धर्म करते हुए मृत्यु श्रेय एवं यश दाई है!
तुम क्षत्रीय हो, इसलिए तुम्हारा धर्म युद्ध है! युद्ध नहीं करेंगे तो तुम्हे पाप लगेगा, और भयंकर दुष्कीर्ती भी संभव है! दुष्कीर्ती योद्धा के लिए मृत्यु से भी दुःख दाई है! इसलिए विजय एवं पराभव न देखतेहुए युद्ध करो!
मूढ जन ऐश्वर्य - सुख - संपत्ती लाभ को लक्ष्य करके कर्म करते है और पुनर्जन्म प्राप्त करते हैं!
विषय पूर्ती केलिए या फल मिलने केलिए काम करनेवाला का कर्म , धर्म व्यवस्तित नहीं है ! क्यों कि -- २/४७
“ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्म फल हेतुभूर्माते सग्ञो$स्त्वकर्मणि !! “
तुम्हे केवल कर्म करने का अधिकार है, कर्म फल का कदापी नहीं! इसलिए कर्म फल केलिए कभी कर्म मत करो! तुम निष्कर्मी भी मत बनो!
धर्म कर्म को त्यागना पाप है! कर्म के कर्तृत्व न लेतेहुए या कर्म अभिमान छोडकर, लाभ- नष्ट में सम भावना से कर्म करो! योग का मतलब है आत्मबुद्धी में स्थिर रहना! मनुष्य परिश्रम से कुछ भी हासिल कर सकता है, मगर तृप्त नहीं होसकता ! कर्म में संतृप्त या संतुष्ट मिलने के लिए योग ज़रूरी है!
कर्म मार्ग में विजय-पराजय न देखते हुए, संयम का आचरण है योग! इसलिच योग में स्थित कर्म संपूर्ण होता है!
कर्म निपुणता ही योग है! योग -- साधना में बुद्धि स्थिर नहीं है तो योग संभव नहीं है! जिसकी बुद्धि स्थिर नहीं है ; उन का मन अनेक चिन्ताओं से ग्रसित रहता है! इसलिए उनको ध्यान या स्थिरप्रज्ञता नहीं हो सकता है और आत्मज्ञान भी नहीं मिलता!
स्थितप्रज्ञ उसे कहते है-- जो व्यक्ति आपत्ती में अधीर न बनता और संपत्ती या गरीबी में, गर्व या ग्लानी नहीं करता है एवं काम क्रोध से वह मुक्त रहता है!
स्थितप्रज्ञता के लाभ के लिए ध्यान बहूत जरूरी है! ध्यान के मार्ग में सबसे बडा विग्ध्न विषयासक्ति अथवा काम है! २/६२-६३ “ ध्यायते विषयान्पुंस सग्ञ स्तोषुपजायते!
संग्ञात् संजायते कामः कामात्क्रोधो$पभिजायते !!
क्रोधातभ्वति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः !
स्मृति भ्रंशद बुद्धिनाशोः बुद्धिनाशात्प्रणश्यति!! “
विषय विचार संग लाता है, संग से क्रोध तथा क्रोध के कारण मोह होता है, मोह से बुद्धिनाश होता है, बुद्धिनाश होने से जीवन का लक्ष्य नष्ट होजाता तथा सर्वनाश होता है ! जिन्हे मन को काबू में रखना या संयम करने नहीं हो पाता है, उन्हे शांन्ती नहीं मिल सकता है!
तूफान जैसे नौका को अपनी अगोस में समेट लेता है वैसे ही विषय से भटका मन, लक्ष्य से भटक जाता है! इसलिए इन्द्रिय संयम केलिए ध्यान करना अति अवश्यक है!
आपत्ती को जानकर कछुआ कैसे अपने अंगोंकी सुरक्षा केलिए अन्दर समेट लेता है, वैसे ज्ञानी मन को इन्द्रिय विषयों से अलगा कर के परमात्मा में जोडकर अपनी सुरक्षा कवच बनाता है! इस से ज्ञान तथा बुद्धि प्रतिष्टित होजाता है, जिसे स्थितप्रज्ञ कहलाता है! वह योगी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करके शीघृ ही शांन्ती प्राप्त करता है, उनका सारा दुःख मिट जाता है!
समुद्र में अनेक नदियाँ मिलती है, फिर भी उस में कोई बदलाव नहीं होता है! इस प्रकार इनद्रियजीता मुनि विषयवान दुनिया में रहते हुए भी उन्हे विषय या काम का बाधा नहीं होता है! परंन्तु एक विषयालू कितना भी विषय भोगले तो भी उनका आशा मिटता नहीं! जो विषय विकारों में डूबारहता है, वह अनेक जन्म तक मोक्ष हीन रहजाता है!
इसलिए हे भारतश्रेष्ट, तुम इन्द्रियों को जीतकर, ज्ञान-विज्ञान नाश करनेवाला- पापस्वरूप काम को नाश करो! आये हुए आशाओं को त्यागकर, आते आशाओं को रोक कर, ममता रहित और अहंकार रहित, मोक्ष प्राप्त करो! इसप्रकार की ब्रह्म निष्टा जो करता है, वह कभी जन्म-मृत्यु की जाल में नहीं फसेंगे, वह मुक्त होजाऐंगे!
मोक्ष प्राप्ती केलिए कर्म करना जरूरी है! क्यों कि - ज्ञान हीन योग तथा योग रहित ज्ञान दोनों मोक्ष लाभकारी नहीं है; इसलिए आगे कर्म योग पर चर्चा करेंगे !
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