भगवद गीता
८. अक्षर ब्रम्ह योग गद्य
नाशहीन अधवा सनातन ब्रम्ह को अक्षर कहते है! हर एक शरीर में जीवन रूप में रहनेवाला ब्रम्ह के अंश को अध्यात्मा कहते हैं! सारे भूतों का उत्पत्ती, वृध्दि के कारण बननेवाला कर्म को यज्ञ कहते है! क्षर रूपी शरीर आदी पदार्थ को अधिभूत मानाजाता है! विराट पुरूष है अधिदैव! हर शरीर के अन्तर्यामि या शरीर में रहकर नियंन्तण करनेवाला के कर्म को अधियज्ञ मानते हैं! ब्रम्ह लोक आदी पुनर्जन्म दाई है, पर हरी के धाम से पुनर्जन्म नहीं होता है!
८/६ “ यंयं वापि स्मरन्भावं त्यजन्ते कलेबरम्
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद भावभावितः “
आत्मा शरीर को त्यागते समय वह जो रूप को याद करता है उस रूप को वह प्राप्त करता है! इसलिए योगी परमात्मा को प्राप्त करने केलिए उन्हे कोनसा रूप में याद करना है, वह बताया है --
८/९-१० “ कविंपुराणामनुशासितारं
मणोरणीयाँसमनु स्मरेद्यः
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपं
आदित्यवर्णं तमसपरस्तात !!
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्यायुक्तो योगबलेन चैव
भ्रूवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक
सतंपरपुरुषमुपैतिदिव्यम “
जिस परम पुरुष के भीतर सर्व भूत स्थित है, वह परम पुरुष को अनन्य भक्ती और समर्पण से प्राप्त करसकता है! वह परम पुरुष को प्राप्त किये योगियाँ को फिर कभी दुःख के कारणवाला, जो दुःखालय कहा गया है वह क्षर शरीर को स्वीकार करना नहीं पडेगा!
फिर भी पुनर्जन्म को पुरीतरह समाप्त करनेवाला विद्या राजविद्या - राजगुह्य योग में बताया है! हरि ओम।।

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