भगवद गीता ७. ज्ञान-विज्ञान योग
जिसने आत्मा को जानलिया फिर और कुछ जानने का जरूरत नहीं है, अधवा ज्ञान का अंत को वह ज्ञानी जान लिया है! परम, अनश्वर सा परमात्मा को न जानतेहुए; बुद्धिहीन लोग ज्ञान नहीं खोजता ; मगर काम मोह में डूबकर व्यर्थ जीवन बिताता है! वे स्व प्रकृति के अनुसार भूत-प्रेत आदी को भजते है! परमातमा परमेश्वर को भजनेवाला भी चार प्रकार के हैं! वै हैं -- दीन, दुःखी, सुख भोगादी के इच्छुक, जिज्ञासु और ज्ञानी लोग! उसमें से केवल ज्ञानी लोग परमात्मा को प्राप्त करते हैं! हरि ओम।।
पाँच भूतों, मन, बुद्धि, अहंकार इति आठ विभूतियों से ईश्वर प्रकृति को चलाता है! परंन्तु, उससेभी उत्तम आत्म स्वरूप विभूति से ईश्वर इस जगत को धारण किया है! इसलिए हमे वह उत्तम परमात्म भाव को सदा स्मरण करना होगा! जिससे उत्पन्न हुआ है यह जगत सारा सबकुछ! मगर उनकी माया के प्रभाव से उन्हे कोई नहीं पहचान सकता है! लेकिन, वह परम पुरुष के शरण में जाकर उनकी क्रृपा से माया को पार करके परमात्मा का दर्शन कर सकता है!
हे भगवान, हमें दर्शन सौभाग्य दीजिए, हरि ओम।।
७/७ “ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय
मयि सर्व मिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव “
परम पुरुष से अलग होकर दुनिया में कुछ नहीं रह सकता! सूत से मणियाँ माला में जैसे ईश्वर में पिरोई है सभी चीज! आत्मा भी परमात्मा में जुडाहुआ है! सर्वत्र वासुदेव ऐसा एकब्रम्ह ज्ञान उत्पन्न होजाता है! इस प्रकार भक्ती से ईश्वर के शरण लेनेवाला योगी अंतकाल में भी परमात्मा के भूतभाव तथा यज्ञ रूप में विराजित ईशवर तत्व को जान कर उसमें लीन होजाता है!
जिस रूप को जानना है या जिस रूप में आत्मा को विलीन होना है या वह अक्षर - अनश्वर रूप को अक्षर ब्रम्ह योग में बताया है! हरि ओम।।

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