Monday, February 17, 2020

भगवद गीता. १७. श्रद्धात्रयविभाग योग

भगवद गीता

१७. श्रद्धात्रयविभाग योग 


१७/२ “ त्रिविधा भवतिश्रद्धा देहिनाँ सा स्वभावजा

सात्विकी राजसीचैव तामसी चेतितां श्रृणु “ 

मनुष्य में सात्विक, राजसिक एवं तामसिक, इस तीन प्रकार के श्रध्दा होती है! सात्विक लोग परमपुरुष इन्द्रादी देवों को पूजता है! राजसिक लोग यक्ष, राक्षसों को पूजता है! तामसिक लोग, भूत-प्रेतों की उपासना करता है! इन लोगों के श्रद्धा, यज्ञ, तप तथा आहार भी भिन्न होते हैं! सात्विक लोग- स्निग्द, हृद्य, पौष्टिक, स्वादिष्ट आहार पसंन्द करते हैं! रजोगुण के लोग- गरम, तीखा, खट्टा, निमकीन आदी तीक्षण आहार पसंन्द करते हैं! तामसी लोग- निस्वादी, ज्यादा पकाहुआ, वासी अन्न पसंन्द करते हैं! 

शास्र के अनुसार, अपने कर्तव्य समझकर, फल अपेक्षा त्याग कर यज्ञ करनेवाला - सात्विक होता है! फल की आशा में अहंपूर्ती केलिए मान, सम्मान पाने हेतु यज्ञ करनेवाला रजोगुण के हैं! विधिविहीन, मंन्त्र विहीन और दक्षिण दान विहीन करता यज्ञ तामसिक हैं! हरी ओम।।


देव, ब्राम्हण, गुरु, ज्ञानी आदी पवित्र जनों की सेवा, पूजा, शैच, निषकपडता, ब्रम्हचर्य, अहिंसा आदी शारीरिक तप है! मृदु भाषण, वेद शास्त्रों का अध्यायन, सत्यवचन आदी वाणी के तप है! मन की निर्मलता, अध्यात्म चिन्तन, संयम, निष्कलंकता आदी मन की तप है! पुण्य स्थल में फल के इच्छा न रखते हुए, शुभ समय पर, योग्य पुरुष को दिया गया दान सात्विक है! प्रतिफल के इच्छा या सुख आदी के मोह में करनेवाला दान राजसिक है! अनुचित स्थान में अयोग्य व्यक्ति को निन्दा के साथ देनेवाला दान होता है तामसिक! 

गीता में श्रद्धा के बारे विशेष प्रकाश डाला है--

१७/३ “ सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत

श्रद्धामयो/यं पुरुषो यो यच्छ्रद्धाः स एव सः “

और वेद में भी कहा है --

श्रद्धा धर्म परः सूक्षमः श्रद्धा यज्ञ हुतं तपः 

श्रध्दा मोक्षंच स्वर्गं च श्रद्धा सर्व मिदं जगत् “ 

जिसकी श्रद्ध जैसा वैसा उन की कर्म गुण भी! श्रद्धा-- धर्म है, ईश्वर है, यज्ञ है, आहूति भी है! श्रद्धा यह जगत केलिए सबकुछ है! अश्रद्धा से करनेवाला कर्म असत है, उस का फल इस लोकजीवन में या परलोक काल में नहीं आयेगा! 

परमात्मा के सक्षात्कार केलिए सात्विक श्रद्धा बढाकर, परम उत्तम मोक्ष मार्ग संन्यास योग का आचरण करना पडेगा  जो अगले अध्याय में कहागया है! 

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