Tuesday, January 7, 2020

भगवद गीता ९. राजविद्या - राजगुह्य योग

९. राजविद्या - राजगुह्य योग 


“ राजविद्या राजगुह्यं पवित्र मिद मुत्तमम्

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यम सुसुखं कर्तुमव्ययं “

यह राजयोग सर्वश्रेष्ट, अतिगोप्य, परिपावन और अभ्यास करने योग्य एवं सरल है! इस राजयोग को अभ्यास करने से जन्म-मरण चक्रों से मुक्त हो जाता है! अविवेकी तथा मूर्ख लोग हिंसा आदी क्रूर कर्मों से आसुरभाव लेनेके कारण जन्म - मरण के चक्र में घूमता रहता है! परम पुरुष को पूजनेवाला सात्विक लोग भी स्वर्ग सुख संपत्ती के इच्छा से स्वर्गारोहण करके पुण्यक्षय होते हि वापस धर्ती में जन्म लेते हैं! 


इन्द्र आदी देव को पूजा करनेवाला उस देव को प्राप्त करता है! भूत, प्रेत आदी के उपासक उनका रूप लेता है! परमात्मा को चिन्तन करनेवाला उनकी धाम पहूँचता है! 

इसलिए उस परमपुरुष के शरण में जाओ और सबकुच्छ उनकेलिए अर्पण करो- ९/२२  “ पत्रं पुष्पं फलं तोयं 

योमे भक्त्या प्रयच्छन्ति

तदहं भक्त्युपहृतमशनामि 

प्रियतात्मनः “ 

पत्ता, पानी जोभी भक्ती भाव से उन्हे अर्पण करता है, उसे स्वीकार करके भक्त को उचित वरदान ईश्वर देता है और भक्तों का योगक्षेम भी करता है! ईश्वर भक्ती से दुरारी भी क्षिप्र से पवित्र बनकर धर्मात्मा बनकर परमेश्वर का परम धाम प्राप्त कर सकता है!  वह परमपुरुष अनेक विभूतियों से प्रकड होता है, जिसका पहचान अगला अध्याय - विभूतिविस्तर योग में बताया है! 

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