भगवद गीता
१४. गुणत्रय विभाग योग
सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण इन तीन गुणों के जरिए प्रकृति शरीर में आत्मा को सुख-दुख रूप के पाशों से बाँन्धकर दुनिया को टिकाता है! सत्व गुण, निर्मल तथा प्रकाशमय और उपद्रव रहित होता है! फिर भी वह ज्ञान केलिए आसक्ति और सुख में संग से बन्धन बनाता है! रजोगुण जो नहीं उसकेलिए आशा और जो मिला है उसपर आसक्ति के कारण राग स्वरूप होता है! उसकेलिए वह शांन्ति एवं ज्ञान को सदा नष्ट करता है! तमोगुण - अज्ञान से प्रमाद, आलस, निद्रा आदी से मोक्ष को बिलकुल रोकता है! यह तीनों गुण एक दूसरे के विरुद्ध होने पर दूसरे को जीतकर विराजमान होता है! जब शरीर में ज्ञानमय प्रकाश होता है तो सत्वगुण की उदय होता है! जब आशा अभिवाज्ञा, कर्मठता, बेताबी आदी बढता है तो रजोगुण बढने की संकेत मिलता है! जब तमोगुण की अतिक्रमण होता है-- तब अविवेक, आलस, मिध्याभिमान आदी उत्पन्न होती है! इस प्रकार गुणविशेष जानकर तमोगुण और रजोगुण से मुक्त रहना है; तथा सत्वगुण को बढाना है!
सत्व गुण के लोग उत्तम माने सूर्य ( ऊर्थ ) लोक और रजोगुण के लोग मध्यवर्ती चनद्र लोक और तमोगुण के लोग नरक रूप अधोलोक प्राप्त करता है! गुणों के परे आत्मा को पहचाननेवाला ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ परमात्मा को प्राप्त करलेता है, वे जीवन जीते ही त्रृगुणों को पार करके सारे व्याधियों से मुक्त होकर सच्चिदानंन्द में स्थित होजाता है!
त्रृगुण सब चीजों में रहता है! गुणों को न देखते हुए निर्गुण भाव से जो रहता है उन्हे मोक्ष निश्चित है! भक्ति ही गुणों को पारकरने का आसान तरीका है! भक्ती से ईश्वर तुरंन्त प्रसन्न होता है, शाश्वत शांन्ति का मुक्ति का, धर्म का, प्रेम - करुणा का तथा अनंन्त आनंन्द का भण्डार है एवं ईश्वर सब का दाता है! मनुष्य अटल भक्ती से परम पुरुष की उपासना करके परम गति प्राप्त करता है! परमगति प्राप्त करने के पहले ईश्वर का क्लिष्ट और उत्तम ( क्षर और अक्षर ) भावों को समझना चाहिए - परमात्मा का श्रेष्ट स्वरूप आगे पुरुषोत्तम योग में बताया गया है! हरि ओम।।
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